Saturday, 23 July 2011

ये क्या हो रहा है

आज का इंसान अपनी जिन्दगी बस यूँ ही ढो रहा है
जागेगा ये कब जो अभी सो रहा है.
बन गए ये कितने बेरहम ?
क्या कोई संवेदना बची ही नहीं ?
भारत आज अपनी सभ्यता KE ITIHAS KO खो रहा है ?
कहीं सोते लोगो पर लाठी भंजती है ,
कहीं नारी की अस्मत लुटती है
गाँधी के देश में आखिर ये क्या हो रहा है ?
जुर्म और कानून का खेल भी निराला हो रहा है ,
जुर्म कर मुजरिम खुले घुमते है और
देखो ये कानून सो रहा है
पड़ोसियों पर भी हम अब
विश्वास कैसे करे
दोस्ती की आड़ में वो देखो
आंतक के बीज बो रहा है----------
JAI HIND JAI BHARAT..





ANU MAM KA SUKRIYA ADA KARNA CHAHUNGA KYUNKI
MERI POST KO UNHONE HINDI ME TYPE KIYA HAI..

ASAL ME MUJHE COMPUTER KE BARE ME JYDA JANKARI NAHI HAI,
MA TO BAS APNE MOBILE SE HI BLOGING KAR LETA HUN OR
MOBILE SE HINDI ME TYPE KARNE ME PROB HOTI HAI ,TAHA CAFE ME JANE KA
TIME NAHI MIL PATA. BUS ME ANU MAM
KO APNI POST BEH DETA HUN OR WO TRANSLATE KAR DETI HAI.....

21 comments:

PK Sharma said...

sahi jaa rahe ho bhai
kya baat hai bhai maar hi daloge

sushma 'आहुति' said...

सही कहा आपने...

सागर said...

sarthak....

सागर said...

sarthak....

anu said...

पूरी कविता खुद में ही अर्थ लिए हुए......बहुत खूब


आगे भी आपको ऐसे ही टाइप करके देती रहूंगी ......आभार

anu

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

हार्दिक अभिवादन -सुन्दर रचना -काश ये सब न हो -
कृपया अपनी रचना का फॉण्ट कुछ बड़ा करें पढने में और आसानी हो
बधाई हो
शुक्ल भ्रमर ५
भ्रमर का दर्द और दर्पण

कहीं सोते लोगो पर लाठी भंजती है ,
कहीं नारी की अस्मत लुटती है
गाँधी के देश में आखिर ये क्या हो रहा है ?

ZEAL said...

bahut sundar kavita ! yathaarth se parichay karati huyi !

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

अपने देश और समाज की वर्तमान दुर्गति एवं ख़त्म होती मानवीय संवेदना का यथार्थ चित्रण

संजय भास्कर said...

दिल को छू रही है यह कविता .......... सत्य की बेहद करीब है ..........

संजय भास्कर said...

धन्यवाद, मेरे ब्लॉग से जुड़ने के लिए और बहुमूल्य टिपण्णी देने के लिए

रेखा said...

उद्देश्यपूर्ण और सार्थक रचना

Babli said...

बहुत सुन्दर रचना लिखा है आपने !दिल को छू गई हर एक पंक्तियाँ! उम्दा प्रस्तुती!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

Babli said...

टिप्पणी देकर प्रोत्साहित करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

सुंदर अभिव्यक्ति... संवेदनशील रचना

Dr Varsha Singh said...

यथार्थ का काव्यमय सुन्दर वैचारिक प्रस्तुतिकरण...

Sunil Kumar said...

सुंदर भावाव्यक्ति क्या सोंच है आपकी बहुत खूब

SAJAN.AAWARA said...

aap logon ka bahut bahut dhanywaad

ज्योति सिंह said...

rachna bahut sundar hai ,main bhi pahli tarikh se aapke blog se jud gayi .shukriyaan

Anil Avtaar said...

Aapko badhai, Anu mam ko dhanyawaad jo we apne blogger sathiyon ki madad karti hain..
Nishant Ji, Acchha likhte hain aap.. likhte rahiye..

NISHA MAHARANA said...

क्या कोई संवेदना बची ही नहीं ?
भारत आज अपनी सभ्यता KE ITIHAS KO खो रहा है ?
कहीं सोते लोगो पर लाठी भंजती है ,
कहीं नारी की अस्मत लुटती है
गाँधी के देश में आखिर ये क्या हो रहा है ?
correct.

ASHOK BIRLA said...

vartaman halat bayan karti kavita .......dosti ki aad me wo dekho aatank ke beej bo raha hai sundar abhivyakti....